Fact-Checking Economic Claims Regarding the Decline of Global Currencies.
राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) के आधुनिक विमर्श में युद्ध अब केवल सीमाओं पर तोपों और फाइटर जेट्स से नहीं लड़े जाते। आज के दौर में ‘अर्थव्यवस्था’ और ‘मुद्रा’ (Currency) सबसे मारक भू-राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। हाल के वर्षों में—विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों के आलोक में—’डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) यानी अमेरिकी डॉलर के पतन और ‘BRICS करेंसी’ के उदय को लेकर मीडिया और इंटरनेट पर दावों की बाढ़ आ गई है।
एक गंभीर रक्षा और सामरिक अध्येता (Strategic Reader) के लिए यह समझना अनिवार्य है कि अंतरराष्ट्रीय वित्त (International Finance) भावनाओं या राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि तरलता (Liquidity), बॉन्ड मार्केट्स और कठोर आर्थिक आंकड़ों से चलता है। क्या अमेरिकी डॉलर वास्तव में ढह रहा है? क्या BRICS देश सच में डॉलर को खत्म करने के लिए कोई एक साझा मुद्रा ला रहे हैं? आइए, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के नवीनतम आंकड़ों, ‘वेपनाइज्ड इंटरडिपेंडेंस’ (Weaponized Interdependence) के सिद्धांतों और 2025-2026 के वैश्विक आर्थिक घटनाक्रमों के आधार पर इन दावों का डेटा-ड्रिवेन फैक्ट-चेक करें।
‘डी-डॉलराइजेशन’ का शोर और IMF के COFER डेटा की अचूक गवाही
इंटरनेट पर सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक (Central Banks) अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह से त्याग चुके हैं और डॉलर का वैश्विक वर्चस्व खत्म हो गया है।
डेटा और आर्थिक यथार्थ:
इस दावे की सच्चाई परखने के लिए हमें IMF के सबसे प्रामाणिक डेटाबेस ‘COFER’ (Currency Composition of Official Foreign Exchange Reserves) का विश्लेषण करना होगा। 2025 की तीसरी तिमाही (Q3 2025) के नवीनतम संशोधित IMF डेटा के अनुसार, दुनिया भर के कुल विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का आकार लगभग 13.0 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। इस विशाल भंडार में आज भी अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 57% के आसपास बनी हुई है। दूसरे स्थान पर यूरो (Euro) है, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 20% है।
यह सच है कि वर्ष 1999 में डॉलर की हिस्सेदारी 71% के चरम पर थी, जो अब घटकर 57% रह गई है। रक्षा विश्लेषकों की भाषा में इसे ‘क्रमिक क्षरण’ (Gradual Erosion) कहा जाता है, न कि ‘पतन’ (Collapse)। डॉलर आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार चालान (Trade Invoicing), विदेशी कर्ज और वैश्विक भुगतान में निर्विवाद रूप से शीर्ष पर है। डॉलर की यह ताकत अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आकार से ज्यादा उसके ‘डीप और लिक्विड’ ट्रेजरी बॉन्ड मार्केट (US Treasury Bond Market) से आती है। दुनिया के किसी भी देश के पास वर्तमान में इतनी क्षमता नहीं है कि वह ट्रिलियनों डॉलर की सुरक्षित संपत्तियां (Safe Assets) रातों-रात दुनिया के निवेशकों को उपलब्ध करा सके।
युआन (RMB) का हौवा: क्या चीनी मुद्रा वास्तव में विकल्प बन रही है?
एक और लोकप्रिय धारणा यह है कि चीन का युआन (Renminbi – RMB) बहुत तेज़ी से अमेरिकी डॉलर की जगह ले रहा है और दुनिया की अगली ‘रिज़र्व करेंसी’ बनने वाला है।
मैक्रोइकॉनॉमिक सीमाएं (Macroeconomic Constraints):
हार्ड डेटा इस धारणा को सिरे से खारिज करता है। IMF के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में चीनी युआन की हिस्सेदारी मात्र 1.9% से 2.1% के बीच स्थिर है। दिलचस्प बात यह है कि डॉलर की जो हिस्सेदारी घटी है, वह युआन के पास नहीं गई, बल्कि वह ‘गैर-पारंपरिक मुद्राओं’ (Nontraditional Currencies) जैसे जापानी येन (Yen), कनाडाई डॉलर (CAD) और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD) के पास गई है।
सामरिक दृष्टिकोण से, कोई भी मुद्रा तब तक ‘ग्लोबल रिज़र्व करेंसी’ नहीं बन सकती जब तक कि वह पूरी तरह से परिवर्तनीय (Fully Convertible) न हो। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ‘पूंजी नियंत्रण’ (Capital Controls) की सख्त नीति अपनाती है। वे नहीं चाहते कि विदेशी निवेशक चीनी बाजारों से जब चाहें अपना पैसा निकाल सकें, क्योंकि इससे उनका राजनीतिक और आर्थिक नियंत्रण कमज़ोर होता है। इसके अलावा, एक सिद्धांत जिसे ‘ट्रिफिन डिलेमा’ (Triffin Dilemma) कहा जाता है, यह स्पष्ट करता है कि रिज़र्व करेंसी वाले देश को दुनिया को अपनी मुद्रा की आपूर्ति करने के लिए लगातार भारी ‘व्यापार घाटा’ (Trade Deficit) सहना पड़ता है। चीन, जो एक निर्यात-संचालित (Export-driven) अर्थव्यवस्था है, कभी भी जानबूझकर इतना बड़ा व्यापार घाटा बर्दाश्त नहीं करेगा। इसलिए, युआन का अंतरराष्ट्रीयकरण एक राजनीतिक नारा अधिक और व्यावहारिक आर्थिक यथार्थ कम है।
‘सिंगल BRICS करेंसी’ का भ्रम बनाम डिजिटल ‘BRICS Pay’ का तकनीकी यथार्थ
हाल ही में विस्तारित हुए BRICS (जिसमें अब मिस्र, ईरान, यूएई, इथियोपिया और 2025 में शामिल हुआ इंडोनेशिया भी हैं) को लेकर यह अफवाह जोरों पर है कि ये देश यूरोप के ‘यूरो’ की तर्ज पर कोई सोने से समर्थित (Gold-backed) ‘सिंगल BRICS फिएट करेंसी’ लॉन्च करने वाले हैं।
भू-राजनीतिक विरोधाभास और भारतीय रुख:
यह पूरी तरह से एक भ्रामक नैरेटिव है। एक साझा मुद्रा के लिए सदस्य देशों के बीच मौद्रिक नीति (Monetary Policy), एक साझा केंद्रीय बैंक और गहरे राजनीतिक एकीकरण की आवश्यकता होती है। भारत, चीन, रूस और ब्राज़ील की अर्थव्यवस्थाओं की संरचना, मुद्रास्फीति दरें और भू-राजनीतिक लक्ष्य एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं।
भारत ने स्पष्ट रूप से इस विचार को खारिज किया है। भारत के नीति-निर्माताओं (जिनमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल शामिल हैं) ने स्पष्ट किया है कि भारत की चीन के साथ कोई साझा मुद्रा बनाने की न तो कोई योजना है और न ही यह भारत के रणनीतिक हितों में है। भारत अपनी राष्ट्रीय मुद्रा ‘रुपये’ (INR) के अंतरराष्ट्रीयकरण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
असली सामरिक पहल कोई ‘नई कागजी मुद्रा’ नहीं है, बल्कि ‘BRICS Pay’ है। यह एक ब्लॉकचेन (DLT) आधारित क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट मैसेजिंग सिस्टम है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों द्वारा नियंत्रित SWIFT प्रणाली को दरकिनार करना है। भारत में होने वाले 2026 के BRICS शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा भी सदस्य देशों की ‘सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी’ (CBDCs) को आपस में जोड़ना (Interoperability) है, ताकि बिना डॉलर के इस्तेमाल के दो देश सीधे अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं (जैसे रुपये और रूबल, या युआन और रियाल) में व्यापार का निपटान कर सकें।
स्वर्ण-संचय (Gold Accumulation): सेंट्रल बैंकों का असली ‘प्रतिबंध-रोधी’ ढाल
अगर अन्य देशों की मुद्राएं डॉलर को विस्थापित नहीं कर रही हैं, तो दुनिया के केंद्रीय बैंक अपनी डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए कर क्या रहे हैं? इसका सटीक और डेटा-समर्थित उत्तर है—भौतिक सोना (Physical Gold)।
संसाधनों का शस्त्रीकरण और सोने की वापसी:
रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में अमेरिका और यूरोप ने रूस के 300 बिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को ‘फ्रीज़’ (Freeze) कर दिया। इस घटना ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों (विशेषकर ग्लोबल साउथ) के मन में एक गहरा ‘सैंक्शन्स रिस्क’ (Sanctions Risk) पैदा कर दिया। वित्तीय विश्लेषक इसे ‘वेपनाइज्ड इंटरडिपेंडेंस’ का सबसे चरम रूप मानते हैं, जहां वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के ‘चोकपॉइंट्स’ (Chokepoints) का उपयोग भू-राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाता है।
इस ‘फ्रीज़िंग’ के डर से बचने के लिए, देशों ने आक्रामक रूप से सोना खरीदना शुरू कर दिया है। सोना किसी भी देश की देनदारी (Liability) नहीं है; इसे कोई भी देश हैक, फ्रीज़ या रद्द नहीं कर सकता।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2015 में RBI के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी मात्र 5.4% थी। लेकिन आक्रामक खरीद (Active Accumulation) के बाद, 2025-2026 के आंकड़ों के अनुसार भारत का स्वर्ण भंडार लगभग 900 मीट्रिक टन के करीब पहुंच गया है, जो कुल रिज़र्व का 14% से अधिक है। चीन (PBOC), रूस और कजाकिस्तान जैसे देशों ने भी रिकॉर्ड स्तर पर सोने की खरीदारी की है। यह है असली डी-डॉलराइजेशन। देश डॉलर को छोड़कर युआन की तरफ नहीं, बल्कि इतिहास की सबसे भरोसेमंद संपत्ति—सोने—की तरफ भाग रहे हैं।
SWIFT का एकाधिकार और ‘वेपनाइज्ड इंटरडिपेंडेंस’ का सामरिक अर्थ
अंतरराष्ट्रीय भुगतानों के लिए दुनिया की 11,000 से अधिक वित्तीय संस्थाएं ‘SWIFT’ (Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication) पर निर्भर हैं। यद्यपि SWIFT बेल्जियम में स्थित है, लेकिन अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और CHIPS (Clearing House Interbank Payments System) के साथ इसके गहरे जुड़ाव के कारण, अमेरिका के पास यह असीमित क्षमता है कि वह किसी भी देश को वैश्विक व्यापार नेटवर्क से बाहर कर सके।
जब अमेरिका किसी देश (जैसे ईरान या रूस) पर वित्तीय प्रतिबंध लगाता है, तो वह केवल अमेरिकी कंपनियों को व्यापार करने से नहीं रोकता, बल्कि वह ‘सेकेंडरी सैंक्शन्स’ (Secondary Sanctions) के ज़रिए दुनिया भर के बैंकों को डराता है कि यदि उन्होंने प्रतिबंधित देश के साथ डॉलर में लेन-देन किया, तो उन्हें भी SWIFT और अमेरिकी बाज़ारों से बाहर कर दिया जाएगा।
यही कारण है कि रूस ने अपना SPFS (System for Transfer of Financial Messages) और चीन ने CIPS (Cross-Border Interbank Payment System) विकसित किया है। हालांकि, आज की तारीख में इनमें से कोई भी प्रणाली SWIFT के विशाल नेटवर्क प्रभाव (Network Effect) का मुकाबला नहीं कर सकती। रक्षा रणनीति के नज़रिए से, जब तक इन वैकल्पिक प्रणालियों में तरलता और वैश्विक विश्वास (Global Trust) स्थापित नहीं होता, तब तक ‘डॉलर का पतन’ एक दूर का सपना ही रहेगा।
वैश्विक भू-अर्थशास्त्र (Geo-economics) का निष्कर्ष यह है कि अमेरिकी डॉलर का कोई भी आसन्न पतन (Imminent Collapse) नहीं हो रहा है। इसके बजाय, हम एक ऐसे बहुध्रुवीय वित्तीय युग (Multipolar Financial Era) की ओर बढ़ रहे हैं, जहां डॉलर सबसे प्रमुख मुद्रा बना रहेगा, लेकिन स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में द्विपक्षीय व्यापार और स्वर्ण भंडार (Gold Reserves) के माध्यम से डॉलर के वर्चस्व को लगातार चुनौती दी जाती रहेगी। एक रक्षा पाठक के लिए इस अंतर को समझना ही सूचना युद्ध (Information Warfare) के इस दौर में असली जागरूकता है।