Why the Global South is Demanding a Larger Say in Internet Governance.
राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीति (Geopolitics) के क्लासिक सिद्धांतों में जो स्थान कभी ‘चोकपॉइंट्स’ (जैसे मलक्का जलडमरूमध्य या स्वेज नहर) का हुआ करता था, 21वीं सदी के तीसरे दशक में वही स्थान अब ‘फाइबर-ऑप्टिक केबल्स’ और ‘रूट सर्वर्स’ (Root Servers) ने ले लिया है। इंटरनेट, जिसे कभी सीमाओं से मुक्त एक ‘यूटोपियन’ वैश्विक गांव माना जाता था, आज दुनिया का सबसे विवादित और मारक ‘संज्ञानात्मक युद्धक्षेत्र’ (Cognitive Battlespace) बन चुका है।
वर्तमान परिदृश्य में, भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे देशों के नेतृत्व में ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) एक अभूतपूर्व कूटनीतिक और तकनीकी बगावत कर रहा है। उनकी मांग स्पष्ट है: इंटरनेट के प्रशासन (Internet Governance) में पश्चिमी देशों और ‘सिलिकॉन वैली’ के तकनीकी दिग्गजों के एकाधिकार को खत्म किया जाए। एक रक्षा और सामरिक अध्येता के रूप में, यह समझना नितांत आवश्यक है कि यह विवाद केवल कुछ तकनीकी प्रोटोकॉल बदलने का नहीं है; यह 21वीं सदी में ‘डेटा संप्रभुता’ (Data Sovereignty), राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ (Digital Colonialism) से मुक्ति का एक पूर्ण पैमाने पर लड़ा जा रहा भू-आर्थिक युद्ध है।
आइए, ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers), अंडरसी केबल नेटवर्क्स (Undersea Cable Networks) और संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम डिजिटल कूटनीति के हार्ड डेटा के आधार पर इस तकनीकी महासंग्राम का एक 360-डिग्री इन्वेस्टिगेटिव विश्लेषण करें।
आबादी बनाम अधिकार: डेमोग्राफिक यथार्थ और संस्थागत नियंत्रण का टकराव
इंटरनेट के प्रशासन में ‘ग्लोबल साउथ’ के असंतोष की जड़ें उस क्रूर गणितीय विषमता में छिपी हैं जो इंटरनेट के उपयोग और उसके नियंत्रण के बीच मौजूद है।
हार्ड डेटा का सामरिक यथार्थ: 2025-2026 के नवीनतम जनसांख्यिकीय और तकनीकी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर इंटरनेट का उपयोग करने वाले लगभग 5.5 बिलियन (550 करोड़) लोगों में से 70% से अधिक लोग एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका (यानी ग्लोबल साउथ) में रहते हैं। अकेले भारत में 900 मिलियन (90 करोड़) से अधिक सक्रिय इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। लेकिन जब बात उन नियमों, प्रोटोकॉल और तकनीकी मानकों को तय करने की आती है जो इस इंटरनेट को चलाते हैं, तो ग्लोबल साउथ की आवाज़ नगण्य है।
इंटरनेट की रीढ़—डोमेन नेम सिस्टम (DNS) और आईपी एड्रेस (IP Address) का आवंटन—ICANN (लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में स्थित) और IETF (Internet Engineering Task Force) जैसी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित होता है। यद्यपि ICANN ने 2016 में अमेरिकी वाणिज्य विभाग के सीधे नियंत्रण से खुद को “स्वतंत्र” कर लिया था, लेकिन इसका ‘मल्टीस्टेकहोल्डर मॉडल’ (Multistakeholder Model) आज भी भारी रूप से पश्चिमी तकनीकी निगमों, थिंक-टैंक्स और अमेरिकी लॉबिस्टों के पक्ष में झुका हुआ है। ग्लोबल साउथ के देशों का तर्क है कि जिस इंटरनेट का 70% डेटा उनके नागरिकों द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, उसकी नीतियां कैलिफोर्निया के बोर्डरूम्स में नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसी किसी ‘बहुपक्षीय’ (Multilateral) और लोकतांत्रिक संस्था में तय होनी चाहिए।
समुद्री केबल्स का शस्त्रीकरण और ‘डेटा’ का भौतिक भूगोल
आम नागरिक सोचता है कि इंटरनेट ‘बादलों’ (Cloud) में तैरता है, लेकिन एक रक्षा विश्लेषक जानता है कि इंटरनेट का 95% से अधिक अंतर्राष्ट्रीय डेटा समुद्र के नीचे बिछी ‘सबमरीन फाइबर-ऑप्टिक केबल्स’ से होकर गुज़रता है। जो इन केबल्स को नियंत्रित करता है, वही आधुनिक दुनिया की ‘इंटेलिजेंस’ (Intelligence) और अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करता है।
ग्लोबल साउथ की चिंता का सबसे बड़ा सामरिक कारण ‘फिजिकल लेयर’ (Physical Layer) पर बिग-टेक का एकाधिकार है। 2010 के दशक की शुरुआत तक, समुद्री केबल्स मुख्य रूप से टेलीकॉम कंपनियों (सरकार समर्थित) द्वारा बिछाई जाती थीं। लेकिन हालिया टेलीजियोग्राफी (TeleGeography) के कठोर डेटा के अनुसार, आज निर्माण होने वाली नई अंतरमहाद्वीपीय केबलों की कुल बैंडविड्थ (Bandwidth) का लगभग 70% हिस्सा अकेले चार अमेरिकी कंपनियों—Google, Meta, Microsoft और Amazon—के स्वामित्व या सीधे नियंत्रण में है।
जब किसी विकासशील देश का सारा डेटा (चाहे वह सरकारी संचार हो या वित्तीय लेनदेन) विदेशी निजी कंपनियों के स्वामित्व वाली केबलों और विदेशी धरती पर स्थित सर्वरों (Data Centers) से होकर गुज़रता है, तो वह देश ‘सिग्नल इंटेलिजेंस’ (SIGINT) और विदेशी जासूसी (जैसे अमेरिकी NSA के PRISM प्रोग्राम) के प्रति पूरी तरह से असुरक्षित हो जाता है। ग्लोबल साउथ की इंटरनेट प्रशासन में हिस्सेदारी की मांग दरअसल अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर ‘डेटा स्थानीयकरण’ (Data Localization) और ‘डिजिटल सीमाओं’ (Digital Borders) को सुरक्षित करने की एक हताश सामरिक कोशिश है।
एल्गोरिदम का साम्राज्यवाद: एआई (AI) प्रशिक्षण और नया ‘संसाधन निष्कर्षण’
डिजिटल भू-राजनीति में एक नई और खतरनाक घटना उभर रही है, जिसे शिक्षाविद ‘डिजिटल उपनिवेशवाद’ (Digital Colonialism) कहते हैं। 19वीं सदी में पश्चिमी औपनिवेशिक ताकतों ने ग्लोबल साउथ से कच्चा माल (जैसे कपास और मसाले) निकाला, अपने कारखानों में उससे महंगे उत्पाद बनाए, और उन्हें वापस उन्हीं उपनिवेशों में भारी मुनाफे पर बेचा। 21वीं सदी में भी यही मॉडल लागू है, बस कच्चे माल की जगह ‘डेटा’ ने ले ली है।
आज जब लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) और जनरेटिव एआई (Generative AI) युद्ध के मैदान और अर्थव्यवस्था को बदल रहे हैं, तो इन मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए पेटाबाइट्स (Petabytes) में डेटा चाहिए। ग्लोबल साउथ के अरबों नागरिक मुफ्त सोशल मीडिया और ऐप्स का उपयोग करके इस ‘कच्चे डेटा’ को जन्म देते हैं। पश्चिमी तकनीकी दिग्गज इस डेटा को ‘स्क्रेप’ (Scrape) करते हैं, अपने एआई मॉडलों को अमेरिका स्थित सर्वरों पर प्रशिक्षित करते हैं, और फिर उन्हीं एआई टूल्स और क्लाउड सेवाओं को भारी सब्सक्रिप्शन शुल्क पर भारत या अफ्रीका को वापस बेचते हैं।
इंटरनेट गवर्नेंस में ग्लोबल साउथ की मांग है कि ‘डेटा’ को एक राष्ट्रीय और संप्रभु संसाधन (Sovereign Resource) माना जाए। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर (जैसे ITU – International Telecommunication Union), देश यह दबाव डाल रहे हैं कि क्रॉस-बॉर्डर डेटा फ्लो (Cross-border data flows) के नियम अब पश्चिमी कंपनियों की ‘प्राइवेसी पॉलिसी’ द्वारा नहीं, बल्कि विकासशील देशों के ‘डेटा संरक्षण कानूनों’ द्वारा शासित होने चाहिए।
‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ (DPI): भारत का सामरिक ‘सॉफ्ट पावर’ काउंटर-ऑपरेशन
इस डिजिटल वर्चस्व के खिलाफ सबसे शक्तिशाली कूटनीतिक और तकनीकी हथियार का नेतृत्व भारत कर रहा है। ग्लोबल साउथ केवल शिकायत नहीं कर रहा है; वह एक वैकल्पिक ढांचा पेश कर रहा है, जिसे ‘डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ (DPI) कहा जाता है।
पश्चिमी मॉडल एक “निजी एकाधिकार” (Private Monopoly) मॉडल है, जहां एक कंपनी (जैसे Apple, Google, या Mastercard) पूरे इकोसिस्टम को नियंत्रित करती है। दूसरी ओर, चीन का मॉडल एक “राज्य अधिनायकवादी” (State Authoritarian) मॉडल है, जहां कम्युनिस्ट पार्टी ‘ग्रेट फायरवॉल’ के ज़रिए इंटरनेट को एक ‘हथियारबंद सर्विलांस टूल’ में बदल देती है।
भारत का DPI (जिसमें आधार, UPI और ONDC शामिल हैं) इन दोनों का एक रणनीतिक और लोकतांत्रिक विकल्प है। यह ‘ओपन प्रोटोकॉल’ (Open Protocols) पर आधारित है, जहां बुनियादी ढांचा राज्य द्वारा निर्मित और सुरक्षित होता है, लेकिन निजी कंपनियां उस पर नवाचार (Innovate) कर सकती हैं। आज, जब भारत ‘इंडिया स्टैक’ (India Stack) को अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया को निर्यात कर रहा है, तो वह न केवल आर्थिक कूटनीति कर रहा है, बल्कि वह उन देशों को पश्चिमी कंपनियों (जैसे वीज़ा या मास्टरकार्ड) और चीनी कर्ज-जाल (Debt-trap) दोनों की डिजिटल गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता दे रहा है। इंटरनेट गवर्नेंस के मंचों पर भारत का बढ़ा हुआ कद इसी ‘डीपीआई कूटनीति’ (DPI Diplomacy) का सीधा सामरिक परिणाम है।
संयुक्त राष्ट्र का ‘ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट’ और संस्थागत रस्साकशी
यह पूरा विवाद अब संयुक्त राष्ट्र (UN) के गलियारों में एक खुले कूटनीतिक युद्ध में तब्दील हो चुका है। ग्लोबल साउथ ‘ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट’ (Global Digital Compact) और ‘संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध संधि’ (UN Cybercrime Treaty) के माध्यम से इंटरनेट के नियमन को ‘मल्टीस्टेकहोल्डर’ (जहां टेक कंपनियों के पास वीटो पावर जैसी शक्ति होती है) से हटाकर ‘मल्टीलैटरल’ (Multilateral – जहां केवल चुनी हुई सरकारों के पास निर्णय लेने का अधिकार हो) मॉडल की ओर धकेलने की आक्रामक कोशिश कर रहा है।
पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ) का तर्क है कि यदि इंटरनेट गवर्नेंस को संयुक्त राष्ट्र या सरकारों के पूर्ण नियंत्रण में लाया गया, तो इससे ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ (Freedom of Speech) नष्ट हो जाएगी और यह रूस और चीन जैसे अधिनायकवादी राज्यों को इंटरनेट को सेंसर करने का कानूनी अधिकार दे देगा। वे ग्लोबल साउथ की संप्रभुता की मांग को “डिजिटल संरक्षणवाद” (Digital Protectionism) का नाम देते हैं।
लेकिन विकासशील देशों के रक्षा और खुफिया योजनाकारों का प्रतिवाद यह है कि “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का ढोंग तब बेनकाब हो जाता है जब कोई पश्चिमी टेक कंपनी (जैसे X या Meta) एकतरफा रूप से किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को बैन कर देती है, या उनके एल्गोरिदम जानबूझकर किसी देश में चुनाव के समय ‘संज्ञानात्मक युद्ध’ (Cognitive Warfare) का माहौल पैदा करते हैं। ग्लोबल साउथ के लिए, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा नहीं है; यह ‘डिजिटल संप्रभुता’ का मुद्दा है।
‘स्प्लिंटरनेट’ (Splinternet) का खौफ और बहुध्रुवीय डिजिटल विश्व
इस ‘स्पेशल रिपोर्ट’ का अंतिम रणनीतिक आकलन यह है कि हम उस इंटरनेट के अंत के गवाह बन रहे हैं जिसे 1990 के दशक में डिजाइन किया गया था। यदि पश्चिमी संस्थान इंटरनेट गवर्नेंस की निर्णय लेने वाली मेज़ पर ग्लोबल साउथ को उनका यथोचित (Proportionate) अधिकार नहीं देते हैं, तो दुनिया ‘स्प्लिंटरनेट’ (Splinternet) की ओर तेज़ी से बढ़ेगी।
स्प्लिंटरनेट यानी इंटरनेट का बाल्कनीकरण (Balkanization)—जहां हर बड़ा देश या क्षेत्रीय गुट अपना खुद का रूट सर्वर, अपने खुद के तकनीकी प्रोटोकॉल और अपने अलग डेटा-लॉक्ड नेटवर्क संचालित करेगा, जो एक-दूसरे से कटे हुए होंगे। रूस का ‘रुनेट’ (RuNet) और चीन का ‘ग्रेट फायरवॉल’ इसकी शुरुआती झलकियां हैं।
ग्लोबल साउथ इस चरम अलगाव को नहीं चाहता, लेकिन वह अब एक ‘डिजिटल उपनिवेश’ बने रहने के लिए भी तैयार नहीं है। 21वीं सदी के शक्ति-संतुलन में, जिसके पास दुनिया का ‘डेटा’ है, उसके पास दुनिया का नियंत्रण है। इंटरनेट के गवर्नेंस पर ग्लोबल साउथ की बगावत केवल नियमों की लड़ाई नहीं है; यह तय करने की जंग है कि भविष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और साइबर स्पेस के साम्राज्य का ‘संविधान’ आखिर कौन लिखेगा।