How Disinformation Campaigns Are Targeting Political Caimpaign.
राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक (Geopolitical) संघर्षों के इतिहास में युद्ध का मैदान हमेशा भौगोलिक रहा है—ज़मीन, समुद्र, और वायु। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में, दुनिया के सबसे शक्तिशाली हथियार अब बैलिस्टिक मिसाइल या लड़ाकू विमान नहीं हैं; वे सर्वर फार्म्स, सोशल मीडिया एल्गोरिदम और ‘जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (Generative AI) के कोड में छिपे हैं।
आज के समय में, किसी संप्रभु राष्ट्र को अस्थिर करने का सबसे अचूक और सस्ता तरीका उसकी सीमाओं पर सेना भेजना नहीं है, बल्कि उसकी लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया (Electoral Process) को ‘हथियारबंद दुष्प्रचार’ (Weaponized Disinformation) से हैक करना है। 2024 और 2025 के ‘सुपर इलेक्शन साइकिल’ ने दुनिया को एक ऐसे संज्ञानात्मक युद्ध (Cognitive Warfare) में धकेल दिया है, जहां सच और झूठ के बीच की रेखा पूरी तरह से मिट चुकी है। एक रक्षा विश्लेषक और रणनीतिक पाठक के रूप में, यह समझना नितांत आवश्यक है कि राजनीतिक अभियानों के खिलाफ यह दुष्प्रचार केवल कुछ भटके हुए युवाओं की ‘ट्रोलिंग’ नहीं है; यह विदेशी खुफिया एजेंसियों, साइबर भाड़े के सैनिकों और संगठित ‘शैडो इकोनॉमी’ द्वारा चलाया जा रहा एक सुविचारित सैन्य अभियान है।
आइए, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के CSET, सर्फ़शार्क (Surfshark) डेटाबेस, और भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (PIB) के नवीनतम 2025-2026 के कठोर आंकड़ों के आधार पर इस डिजिटल युद्ध की कार्यप्रणाली का तकनीकी पोस्टमार्टम करें।
‘सुपर इलेक्शन साइकिल’ का डिजिटल रणक्षेत्र और डेटा का विस्फोट
वर्ष 2024 और 2025 को वैश्विक स्तर पर ‘सुपर इलेक्शन ईयर’ कहा गया, क्योंकि इन दो वर्षों में 60 से अधिक देशों (जिनमें दुनिया की आधी से अधिक आबादी रहती है) में राष्ट्रीय चुनाव हुए। इसी समय ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स’ (LLMs) और एआई वीडियो जनरेटर आम जनता के लिए पूरी तरह से सुलभ हो गए।
साइबर सुरक्षा फर्म ‘सर्फ़शार्क’ (Surfshark) की नवीनतम 2025-2026 रिपोर्ट के हार्ड डेटा के अनुसार, 2021 के बाद से दुनिया भर के 38 देशों ने अपने चुनावों के दौरान प्रत्यक्ष ‘डीपफेक’ (Deepfake) दुष्प्रचार अभियानों का सामना किया है। इन अभियानों ने सामूहिक रूप से लगभग 3.8 बिलियन (380 करोड़) की आबादी को प्रभावित किया है। सबसे चौंकाने वाला तकनीकी पहलू यह है कि इन डीपफेक और ‘सिंथेटिक मीडिया’ को फैलाने के लिए 92% मामलों में प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (X, Facebook, TikTok) का इस्तेमाल ‘वेपन डिलीवरी सिस्टम’ (हथियार वितरण प्रणाली) के रूप में किया गया।
यह कोई यादृच्छिक (Random) घटना नहीं थी। यह एक स्पष्ट संकेत है कि चुनाव प्रचार अब ज़मीनी रैलियों से ज्यादा ‘डेटा माइनिंग’ और ‘माइक्रो-टार्गेटिंग’ के ज़रिए लड़ा जा रहा है, जहां एआई एल्गोरिदम हर वोटर की मनोवैज्ञानिक भेद्यता (Psychological Vulnerability) को पहचान कर उसे उसी के अनुरूप ‘फर्जी सामग्री’ परोसते हैं।
भारत का चुनावी परिदृश्य: ‘सिंथेटिक’ अर्थव्यवस्था और सीमा-पार सूचना आतंकवाद
जब बात भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की आती है, तो दुष्प्रचार का पैमाना (Scale) और भी विकराल हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय डेटा के अनुसार, भारत के 2024 के आम चुनावों में राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े ‘प्रॉक्सी’ नेटवर्क्स ने एआई-जनरेटेड सामग्री (AI-generated content) पर अनुमानित $50 मिलियन (लगभग 400 करोड़ रुपये) खर्च किए। इसमें मृत नेताओं के एआई अवतारों से लेकर विपक्षी उम्मीदवारों के खिलाफ मानहानि करने वाले ‘चीपफेक’ (Cheapfake) और डीपफेक तक सब शामिल था।
लेकिन यह केवल घरेलू राजनीतिक खींचतान नहीं है; रक्षा दृष्टिकोण से यह एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। मार्च 2026 में, भारत सरकार की PIB फैक्ट-चेक यूनिट (FCU) ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट के अनुसार, महज़ एक महीने के भीतर 50 से अधिक उच्च-स्तरीय डीपफेक और मैनिपुलेटेड वीडियो पकड़े गए, जिन्हें स्पष्ट रूप से “पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा हैंडल्स” द्वारा भारतीय सूचना तंत्र में धकेला जा रहा था।
दुश्मन देश के साइबर ऑपरेटरों ने प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और सेना प्रमुख के एआई-जनरेटेड फर्जी वीडियो बनाए। एक वीडियो में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के होठों की हरकतों (Lip-syncing) को एआई के ज़रिए बदलकर यह झूठा दावा किया गया कि “भारत ने इज़राइल द्वारा अफ़ग़ानिस्तान को पैसे देने की बात कबूली है।” इसी तरह, भारतीय वायुसेना के अधिकारियों के डीपफेक बनाकर तेजस (Tejas) लड़ाकू विमानों के खिलाफ खौफ फैलाने की कोशिश की गई। यह ‘क्रॉस-बॉर्डर इन्फॉर्मेशन टेररिज्म’ का जीता-जागता प्रमाण है, जहां विदेशी राज्य-कर्ता (State-actors) भारत के सामाजिक ताने-बाने और सैन्य मनोबल को तोड़ने के लिए सीधे हमारे नागरिकों के स्मार्टफोन को निशाना बना रहे हैं।
स्टेट-स्पॉन्सर्ड इंटरफेरेंस: ‘स्टॉर्म-1516’ और ‘ऑपरेशन ओवरलोड’
वैश्विक स्तर पर, राजनीतिक अभियानों को हाईजैक करने का सबसे परिष्कृत काम रूस और चीन की साइबर कमानों द्वारा किया जा रहा है। दुष्प्रचार अब केवल ‘फेक न्यूज़’ छापने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ‘समानांतर सत्य’ (Parallel Reality) का निर्माण कर लिया है।
जर्मनी के राष्ट्रीय चुनावों के दौरान, पश्चिमी खुफिया एजेंसियों ने ‘स्टॉर्म-1516’ (Storm-1516) नामक एक कुख्यात रूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया। इस नेटवर्क ने कुछ ही हफ्तों के भीतर 100 से अधिक पूरी तरह से एआई-संचालित फर्जी न्यूज़ वेबसाइटें (AI-powered Websites) खड़ी कर दीं। ये वेबसाइटें देखने में बिल्कुल प्रतिष्ठित जर्मन मीडिया पोर्टल्स जैसी लगती थीं, लेकिन वे पूरी तरह से जनरेटिव एआई द्वारा लिखे गए लेख और डीपफेक वीडियो प्रकाशित कर रही थीं, जिनका लक्ष्य जर्मन राजनेताओं को बदनाम करना और नाटो (NATO) के खिलाफ जनमत तैयार करना था।
इसी तरह, ‘इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग’ (ISD) की 2025 की रिपोर्ट ने ‘ऑपरेशन ओवरलोड’ (Operation Overload) का खुलासा किया। यह एक रूसी-समर्थित अभियान था जिसने 80 से अधिक प्रमुख यूरोपीय और अमेरिकी संगठनों की पहचान चुराई (Impersonation)। उन्होंने एआई का उपयोग करके संस्थाओं के लोगो (Logos) और कर्मचारियों की आवाज़ों की हूबहू नकल की ताकि यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सहायता के खिलाफ पश्चिमी मतदाताओं के मन में अविश्वास पैदा किया जा सके।
डिस्इन्फॉर्मेशन ‘किल चेन’: RICHDATA फ्रेमवर्क का सामरिक विश्लेषण
रक्षा रणनीति में एक हमले को समझने के लिए ‘किल चेन’ (Kill Chain) का उपयोग किया जाता है। फरवरी 2026 में, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के Center for Security and Emerging Technology (CSET) ने दुष्प्रचार अभियानों के लिए ‘RICHDATA’ फ्रेमवर्क पेश किया। यह फ्रेमवर्क साबित करता है कि आधुनिक राजनीतिक दुष्प्रचार एक डिजिटल मार्केटिंग अभियान की तरह चलता है, जिसके पीछे दुर्भावनापूर्ण सैन्य इरादे होते हैं।
इस ‘किल चेन’ के कई चरण होते हैं:
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रेकनिसेंस (Reconnaissance): सबसे पहले एआई टूल्स के ज़रिए लक्षित देश के मतदाताओं के सोशल मीडिया डेटा (जैसे उनकी धार्मिक, जातीय या आर्थिक असुरक्षाएं) को स्कैन किया जाता है।
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इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure): इसके बाद, हजारों फर्जी एआई-संचालित ‘बॉट अकाउंट्स’ (Bot Accounts) और ‘डीपफेक पर्सोना’ (Deepfake Personas) बनाए जाते हैं, जिनकी प्रोफाइल तस्वीरें और जीवन की कहानियां तक एआई द्वारा गढ़ी गई होती हैं।
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एम्प्लीफिकेशन (Amplification): एक बार जब कोई फर्जी डीपफेक वीडियो (जैसे अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडेन का वह कुख्यात फर्जी रोबोकॉल जिसमें डेमोक्रेट्स को वोट न देने के लिए कहा गया था) इंटरनेट पर डाला जाता है, तो ये बॉट नेटवर्क एल्गोरिदम को चकमा देकर उस वीडियो को कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंचा देते हैं।
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ट्रोलिंग और इंगेजमेंट (Trolling): यह इंटरनेट का ‘हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट’ (Hand-to-hand combat) है, जहां मानव ऑपरेटर और एआई चैटबॉट्स मिलकर उन असली यूज़र्स से बहस करते हैं जो सच्चाई बताने की कोशिश कर रहे हों, ताकि पूरी बहस को एक ज़हरीले शोर (Toxic Noise) में बदल दिया जाए।
शैडो इकॉनमी: जब ‘फेक न्यूज़’ करोड़ों डॉलर का कारोबार बन जाए
दुष्प्रचार अभियानों को केवल भू-राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि एक विशाल ‘वित्तीय प्रोत्साहन’ (Financial Incentive) से भी ऊर्जा मिल रही है। 2025 के चुनावों ने एक भयानक नई ‘शैडो इकॉनमी’ (Shadow Economy) को जन्म दिया।
द ट्यूरिंग इंस्टीट्यूट (CETaS) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक अभियानों के इर्द-गिर्द एआई द्वारा संचालित धोखाधड़ी एक बहुत बड़ा उद्योग बन चुका है। उदाहरण के लिए, 2022 में अमेरिकी चुनावों के दौरान दुष्प्रचार फैलाने वाली शीर्ष 40 वेबसाइटों ने विज्ञापन राजस्व (Ad Revenue) में अनुमानित $42.7 मिलियन कमाए।
2025 में यह ट्रेंड और घातक हो गया। रोमानिया के राष्ट्रपति चुनाव (मई 2025), चेक गणराज्य के संसदीय चुनाव (अक्टूबर 2025), और कनाडा के संघीय चुनाव (अप्रैल 2025) में एक समान पैटर्न देखा गया। साइबर अपराधियों ने बड़े राजनीतिक उम्मीदवारों के अत्यधिक यथार्थवादी डीपफेक वीडियो बनाए, जिनमें वे उम्मीदवार चुनाव प्रचार के बीच में किसी ‘फर्जी क्रिप्टोकरेंसी’ या ‘सरकारी निवेश योजना’ का प्रचार कर रहे थे। चूंकि चुनाव के समय राजनेताओं के हर बयान को गंभीरता से लिया जाता है, इसलिए आम मतदाताओं ने इन ‘डीपफेक विज्ञापनों’ पर विश्वास करके अपने बैंक खाते खाली कर दिए। 2025 की पहली तिमाही में ही डीपफेक-संचालित धोखाधड़ी से वैश्विक स्तर पर $200 मिलियन से अधिक का वित्तीय नुकसान हुआ। यह ‘प्रॉफिट-मोटिव’ विदेशी राज्य-कर्ताओं को ऐसे भाड़े के हैकर्स (Amplification-for-hire) आसानी से उपलब्ध कराता है जो पैसे के लिए किसी भी चुनाव को हैक करने के लिए तैयार हैं।
‘लायर्स डिविडेंड’ (Liar’s Dividend): सत्य के पतन का मनोवैज्ञानिक हथियार
सामरिक विश्लेषकों के अनुसार, एआई-संचालित दुष्प्रचार का सबसे बड़ा और सबसे विनाशकारी प्रभाव यह नहीं है कि लोग ‘झूठ’ पर विश्वास करने लगते हैं; असली खतरा यह है कि वे ‘सच’ पर विश्वास करना बंद कर देते हैं। मनोविज्ञान और सूचना युद्ध में इस परिघटना को ‘लायर्स डिविडेंड’ (Liar’s Dividend) कहा जाता है।
जैसे-जैसे डीपफेक तकनीक परिष्कृत हो रही है (अब एआई और मानव-निर्मित सामग्री को बिना विशेष सॉफ्टवेयर के अलग करना लगभग असंभव है), इसका फायदा भ्रष्ट राजनेताओं और विरोधी ताकतों को मिल रहा है। यदि किसी राजनेता का कोई असली, प्रामाणिक वीडियो लीक होता है जिसमें वह रिश्वत ले रहा हो या देश-विरोधी बातें कर रहा हो, तो वह अब आसानी से उस असली सबूत को “यह तो एक एआई डीपफेक है” कहकर खारिज कर सकता है।
जब समाज का हर नागरिक यह मानने लगे कि उसकी आंखों देखी और कानों सुनी कोई भी चीज़ ‘सिंथेटिक’ या फर्जी हो सकती है, तो उस समाज में ‘सत्यापित तथ्यों’ (Verified Facts) का आधार ही ढह जाता है। एक जीवंत लोकतंत्र ‘साझा वास्तविकता’ (Shared Reality) पर टिका होता है। यदि विदेशी दुष्प्रचार और डीपफेक उस वास्तविकता को ही एक भ्रम (Illusion) में बदल दें, तो चुनाव केवल एक तमाशा बनकर रह जाते हैं।
रक्षात्मक रणनीति: ‘कॉग्निटिव सिक्योरिटी’ और भविष्य का खाका
हम ‘डेटा वेपनाइज़ेशन’ (Data Weaponization) के जिस मुहाने पर खड़े हैं, वहां केवल ‘फैक्ट-चेकिंग’ करना एक छेद वाली बाल्टी में पानी भरने जैसा है। जब तक किसी सच का फैक्ट-चेक पब्लिश होता है, तब तक दुष्प्रचार करोड़ों लोगों के ‘कॉग्निटिव फ्रेमवर्क’ को दूषित कर चुका होता है।
आधुनिक राष्ट्रों को अपनी रक्षा रणनीतियों में ‘संज्ञानात्मक सुरक्षा’ (Cognitive Security) को उसी स्तर पर शामिल करना होगा जिस स्तर पर वे वायु रक्षा प्रणाली (Air Defense System) को करते हैं। इसके लिए ‘ज़ीरो-ट्रस्ट’ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कानूनी रूप से बाध्य किया जाना चाहिए कि वे एआई-जनरेटेड सामग्री पर ‘इनविज़िबल डिजिटल वॉटरमार्क’ (Digital Watermarking) और ‘कंटेंट प्रूवेनेंस’ (Content Provenance) मानक लागू करें। इसके साथ ही, भारत जैसे देशों को ‘नेशनल कॉग्निटिव सिक्योरिटी सेंटर’ (NCSC) स्थापित करने की सख्त आवश्यकता है, जो रीयल-टाइम में बॉट-नेटवर्क्स और स्टेट-स्पॉन्सर्ड डीपफेक अभियानों को चुनाव से पहले ही ‘न्यूट्रलाइज़’ कर सके।
इस नए युद्ध में, अज्ञानता कोई बचाव नहीं है। एक ऐसा समाज जो अपने सूचना स्रोतों की सत्यता को नहीं पहचान सकता, वह अपने लोकतंत्र को बहुत लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख पाएगा।